Friday, 30 November 2012

जबकि, जानता हूँ...

रात को जब, लेटता हूँ,
तो छत पर तारे दिखते हैं,
और मैं, उन्हें गिनता हूँ।
जबकि, जानता हूँ, गिन नहीं पाउँगा।।।

सुबह मेरे ऑफिस के टेबल पर,
काग़ज के फूल खिले होते हैं,
और मैं, उन्हें सूंघ लेता हूँ,
जबकि, जानता हूँ, वो नकली हैं।।।

राह में जब, कोई भिखारी दिखता है,
ज़ेब से निकाल कर चंद सिक्के,
उसकी ओर उछाल कर,
बहोत गौरवान्वित महसूस करता हूँ,
जबकि, जानता हूँ,
उस दो रूपये के सिक्के से,
उसका पेट नहीं भरेगा।।।

रोज सुबह ऑफिस जाता हूँ,
रात देर से घर आता हूँ,
बनाता हूँ, खाता हूँ, और सो जाता हूँ,
जबकि, जानता हूँ,
ये मेरी ज़िन्दगी नहीं,
फिर भी, जीता हूँ।।।

हम हमेशा, वो सब कहते हैं,
समझते हैं, और करते हैं,
जो हम नहीं चाहते।।।

और, कभी नहीं सुनते,
समझते, कहते, और करते,
जो, हमारा दिल चाहता है।।।

मेरे पेट से...

कभी-कभी, मेरे पेट से,
कुछ आवाज़ें आती हैं।
जब मैंने, किसी एक वक़्त का,
भोजन, नहीं कर पाया होता है। (किन्ही कारणों से)

तब सोचता हूँ,
ये इतना भी मजबूर नहीं,
जितना,
एक वक़्त का खाना ना खाकर,
अपने बच्चों को ज़िन्दगी देनेवाले माँ-बाप।

जितना,
कई दिनों से भूखा बैठा हुआ भिखारी।
फिर भी मेरा पेट तो, गुडुर-गुर्रररर करके,
अपनी बात कह लेता है।

पर वो लोग,
कभी अपनी व्यथा नहीं कहते,
ना किसी से,
ना अपने-आप से।।।

रोज रात...

रोज रात,
जो सितारे, आसमां पर चमकते हैं,
आ जाते हैं, मेरे कमरे में,
और चमकते हैं, छत से चिपककर,
और मैं, उन्हें टकटकी बांधे देखता हूँ।
शायद, वो भी मुझे देखते होंगे।

उनके आने का सबब,
ना तो उन्होंने मुझे बताना ज़रूरी समझा,
और, ना मैंने, जानना।

ज़रूरी था, तो बस,
उनका यूँ ही रोज, आ जाना,
और मेरा उनको, टकटकी बांधे देखना।
बिना किसी शक, और सवाल के।।।

Friday, 26 October 2012

शहर में सुना है फिर दंगा हुआ है...


ईमान फिर किसी का नंगा हुआ है.
शहर में सुना है फिर दंगा हुआ है..
वो एक पत्थर, पहला जिसने चलाया है.
ईमान बस उसी का ही नंगा हुआ है..
शहर में सुना है फिर दंगा हुआ है..
फिर से गलियां देखो खूनी हुई हैं.
गोद कितने मांओं की सूनी हुई हैं..
उस इन्सान का, क्या कोई बच्चा नहीं है?
वो इन्सान क्या, किसी का बच्चा नहीं है??
हाँ, वो किसी हव्वा का ही जाया है.
वो एक पत्थर, पहला जिसने चलाया है.
ईमान बस उसी का ही नंगा हुआ है.. शहर में सुना है फिर दंगा हुआ है...
लोथड़े मांस के लटक रहे हैं.
खून किसी खिडकी से टपक रहे हैं..
आग किसी की रोज़ी को लग गयी है.
कोई बिन माँ की रोजी सिसक रही है..
हर एक कोने आप में ठिठक गये हैं.
बच्चे भी अपनी माँओं से चिपक गये हैं..
इन्सानियत का खून देखो हो रहा है.
ऊपर बैठा वो भी कितना रो रहा है..
दूर से कोई चीखता सा आ रहा है.
खूनी है, या जान अपनी बचा रहा है..
और फिर सन्नाटा सा पसर गया है.
जो चीख रहा था, क्या वो भी मर गया है??
ये सारा आलम उस शख्स का बनाया है.
वो एक पत्थर, पहला जिसने चलाया है.
ईमान बस उसी का ही नंगा हुआ है.. शहर में सुना है फिर दंगा हुआ है...
वक्त पर पोलीस क्यों नहीं आई?
क्योंकी, ये कोई ऑपरेशन मजनूं नहीं था..
नेताओं ने भी होंठ अपने बन्द रक्खे.
क्योंकि, खून से हाथ उनके भी थे रंगे..
सरकार भी चादर को ताने सो रही थी.
उनको क्या, ग़र कोई बेवा हो रही थी..
पंड़ित औ मौलवी भी थे चुपचाप बैठे.
आप ही आप में दोनों थे ऐंठे..
हमने भी, अपना आपा खो दिया था.
जो हो रहा था, हमने वो खुद को दिया था..
दोषी हम सभी हैं, जो दंगे हुए हैं.
ईमान हम सभी के ही, नंगे हुए हैं..
खून से हाथ हमसभी के ही, रंगे हुए हैं...
पर दंगे का वो सबसे बड़ा सरमाया है.
वो एक पत्थर, पहला जिसने चलाया है.
ईमान बस उसी का ही नंगा हुआ है.. शहर में सुना है फिर दंगा हुआ है...
चंद सिक्कों की हवस, और कुछ नहीं था.
हिन्दू ना मुसलमां, कोई कुछ नहीं था..
हिन्दू नहीं, जो इन्सान को इन्सां ना समझे.
मुसलमां नहीं, जो इन्सानियत को ईमां ना समझे..
आपस में लड़ाये धर्म है हैवानियत का.
प्यार ही इक धर्म है इन्सानियत का..
हम कब तलक ऐसे ही सोते रहेंगे?
भड़कावे में गैरों के, अपनों को खोते रहेंगे??
बेशर्मों से तब तलक हम नंगे होते रहेंगे?
बहकावे में जब तलक दंगे होते रहेंगे!! बहकावे में जब तलक दंगे होते रहेंगे!!!
मेरे शहर फ़ैज़ाबाद में हुए दंगे से द्रवित और दुःखित -  सुनील गुप्ता 'श्वेत'

Monday, 18 June 2012

मेरे पापा....


गाँवों की पगडंडियों पर मुझे घुमाते, मेरे पापा.
चार आने की चार टाफियां खिलाते, मेरे पापा..
पकड के उँगली मुझे स्कूल ले जाते, मेरे पापा.
बचपन में ही डाक्टर, इंजीनियर बनाते, मेरे पापा..
मेरी गलतियों पर मुझे चपत लगाते, मेरे पापा.
कुछ अच्छा करने पर पीठ थपथपाते, मेरे पापा..
जब कुछ बडा हुआ गलत सही समझाते, मेरे पापा.
दुनियां के हर शय से परिचित कराते, मेरे पापा..
अब मैं बडा हो गया हूँ,
अपने पैरों पर खडा हो गया हूँ.
तो बस यही सोचता हूँ,
क्या मैं बन पाउँगा, जैसे हैं मेरे पापा?
क्या मैं अपने बच्चे को वो सब दे पाउँगा?
क्या मैं मेरे पापा की तरह अच्छा पापा बन पाउँगा??
क्या मैं बन पाउँगा,
मेरे बच्चे के लिए...
मेरे पापा....

Friday, 15 June 2012

हमें, इजाजत नहीं है !!!


हाल-ए-दिल अपना, सुनाने की इजाजत नहीं है.
हमें दुःख अपना, बताने की इजाजत नहीं है..
उन्हें फुरसत नहीं है, हमपर सितम करने से.
और हमें, छटपटाने की भी इजाजत नहीं है..
वो हमें लूटें, कि मारें, या चाहे कत्ल कर दें.
सर हमें अपना उठाने की इजाजत नहीं है..
अधिकार बोलने का सुरक्षित है, अब तो संसद में.
आवाम को तो खुसफुसाने की भी इजाजत नहीं है..
फुरकत में वो आज इतना है कि, मिलने को आता नहीं.
और हमको उसके पास, जाने की भी इजाजत नहीं है..
वो मजाक कर रहे हैं, देश के भविष्य से और.
कार्टून भी हमें उनका, बनाने की इजाजत नहीं है..

Tuesday, 12 June 2012

बुनियाद जिसकी खोखली हो, वो मकान क्या होगी..


जो वदों से अपने मुकर जाए, वो जुबान क्या होगी.
बुनियाद जिसकी खोखली हो, वो मकान क्या होगी..
छाया तलक ना दे सके, वो वृक्ष है किस काम का.
दो बूंद को तरसे जमीं, वो आसमान क्या होगी..
फैला हुआ असमानता का जाल हो जिस देश में.
है सोचने की बात, वहाँ का संविधान क्या होगी..
हर फिक्र छोडकर के, सो जाता है ’श्वेत’ जिस जगह.
माँ के आँचल के सिवा, कोई और जहान क्या होगी..
रावण भरे पडे हैं यहाँ, राम के मुखौटों में.
है ’श्वेत’ सोच में पडा, विधि का विधान क्या होगी..